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प्रीमेन्स्ट्रुअल टेंशन (PMT): लक्षण और यौगिक दृष्टिकोण
परिभाषा
प्रीमेन्स्ट्रुअल टेंशन, जिसे आमतौर पर PMT कहा जाता है, उन लक्षणों के समूह को कहते हैं जिनका अनुभव कुछ महिलाओं को उनके मासिक धर्म से पहले होता है। ये लक्षण मासिक धर्म से पहले के दो सप्ताहों में दिखाई दे सकते हैं और इनमें शारीरिक असुविधा, भावनात्मक बदलाव और एकाग्रता में कठिनाई शामिल हो सकती है।
यह अनुभव हर महिला में अलग-अलग होता है। कुछ महिलाएँ केवल हल्के बदलाव महसूस करती हैं, जबकि कुछ को एक साथ कई लक्षणों का अनुभव होता है। हर मासिक चक्र में इनकी तीव्रता भी अलग-अलग हो सकती है। इस विवरण का अनुमान है कि हर चार में से तीन महिलाएँ मासिक धर्म से पहले के लक्षणों का अनुभव करती हैं।
कारण
इस विवरण में दी गई व्याख्या PMT को मासिक चक्र के दौरान महिला हार्मोनों में होने वाले बदलावों से जोड़ती है। इसमें प्रोजेस्टेरोन नामक हार्मोन की चर्चा की गई है, जो गर्भाशय को निषेचित अंडे को ग्रहण करने के लिए तैयार करने में सहायक होता है। हार्मोन की गतिविधि में होने वाले बदलावों को मासिक धर्म से पहले की अवस्था से जोड़ा गया है।
नमक और पानी के रुकने (जल-धारण) की भी चर्चा की गई है। शरीर में तरल पदार्थ के जमा होने का अनुभव सूजन, फूलापन, भारीपन या वज़न में अस्थायी बदलाव के रूप में हो सकता है।
पोषण संबंधी व्याख्या आवश्यक वसा अम्लों (एसेंशियल फैटी एसिड), जिनमें लिनोलिक अम्ल भी शामिल है, और विटामिन B6 की ओर ध्यान दिलाती है। स्रोत इन पोषक तत्वों के अपर्याप्त सेवन को हार्मोन या मासिक धर्म की अनियमितताओं से जोड़ता है। ये पोषण संबंधी बिंदु इस स्थिति की उसकी व्यापक व्याख्या का हिस्सा हैं।
लक्षण
PMT में शारीरिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक लक्षण हो सकते हैं। हर किसी को होने वाली असुविधा एक जैसी नहीं होती। अलग-अलग लक्षण अलग-अलग संयोजनों में और अलग-अलग तीव्रता के साथ हो सकते हैं।
1. शारीरिक और सामान्य लक्षण
- चिड़चिड़ापन: रोज़मर्रा की परिस्थितियों से जल्दी नाराज़ या परेशान हो जाना।
- चिंता: फ़िक्र, बेचैनी या भावनात्मक तनाव का अनुभव करना।
- मनोदशा में बदलाव: मासिक धर्म से पहले भावनात्मक प्रतिक्रियाओं में बदलाव महसूस करना।
- थकान: थका हुआ महसूस करना या ऊर्जा में कमी का अनुभव करना।
- आक्रामकता: सामान्य से अधिक तीखी या तीव्र प्रतिक्रिया देना।
- वज़न बढ़ना: वज़न में अस्थायी बदलाव महसूस करना, कभी-कभी तरल के रुकने के साथ।
- अवसाद: उदासी या मन के उतरे होने का अनुभव करना।
- मानसिक भ्रम और शारीरिक या मानसिक थकान: थका हुआ महसूस करते हुए साफ़ सोचने में अधिक कठिनाई होना।
- भूलने की प्रवृत्ति: रोज़मर्रा की बातें याद रखने में कठिनाई होना।
- शरीर में दर्द: दर्द या सामान्य शारीरिक असुविधा का अनुभव करना।
- रोने के दौर: आसानी से आँखों में आँसू आ जाना।
- स्तनों में कोमलता: स्तनों में संवेदनशीलता या असुविधा का अनुभव करना।
- सामान्यीकृत शोफ (एडीमा): शरीर के अलग-अलग हिस्सों में सूजन या फूलापन महसूस करना।
- मनोदशा का उतार-चढ़ाव (मूड स्विंग): अलग-अलग भावनात्मक अवस्थाओं के बीच बदलते रहना।
- त्वचा की समस्याएँ: त्वचा की स्थिति में बदलाव महसूस करना।
- जल-धारण: रुके हुए तरल के कारण भरापन, फूलापन या भारीपन का अनुभव करना।
2. मनोवैज्ञानिक लक्षण
- कामेच्छा में कमी: यौन रुचि में कमी।
- अवसाद: उदासी या मन के उतरे होने की भावना।
- अनिद्रा: नींद आने में कठिनाई या आरामदायक नींद बनाए रखने में कठिनाई।
- चिड़चिड़ापन: रोज़मर्रा की घटनाओं के प्रति बढ़ी हुई संवेदनशीलता।
- एकाग्रता की कमी: कामों पर ध्यान बनाए रखने में कठिनाई।
- रुआँसापन: आसानी से आँखों में आँसू आने की अधिक प्रवृत्ति।
ये मनोवैज्ञानिक अनुभव शारीरिक असुविधा के साथ-साथ हो सकते हैं, जिससे मासिक धर्म से पहले का समय अधिक कठिन हो जाता है।
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यौगिक दृष्टिकोण
वर्णित कार्यक्रम में नौ घटक एक साथ आते हैं: शुद्धि क्रियाएँ, योगासन, प्राणायाम, बंध, मुद्राएँ, ध्यान, आहार, संगीत और उपवास।
1. षट्कर्म: शुद्धि की विधियाँ
जल नेति: पानी से नाक की सफ़ाई
जल नेति कार्यक्रम में सूचीबद्ध शुद्धि क्रिया है। यह शुद्धि की पारंपरिक यौगिक पद्धति का हिस्सा है और इसका अर्थ है नासिका मार्ग को पानी से साफ़ करना।
2. योगासन: योग की मुद्राएँ
आसन वाले भाग में ये शामिल हैं:
- त्रिकोणासन: त्रिभुज मुद्रा
- पद्मासन: कमल मुद्रा
- सर्वांगासन: कंधों के बल खड़े होने की मुद्रा
- विपरीत करणी: उल्टी या विपरीत मुद्रा
- शवासन: शव मुद्रा
- पश्चिमोत्तानासन: बैठकर आगे झुकने की मुद्रा
- वज्रासन: वज्र या अटल मुद्रा
- शीर्षासन: सिर के बल खड़े होने की मुद्रा
- मत्स्यासन: मछली मुद्रा
इस सूची में खड़े होकर, बैठकर, उल्टे होकर, आगे झुककर और विश्राम की मुद्राएँ शामिल हैं। ये सब मिलकर कार्यक्रम में बताए गए शारीरिक अभ्यासों को दर्शाती हैं।
3. प्राणायाम: श्वास के अभ्यास
- शीतकारी: शरीर को ठंडक देने वाला एक पारंपरिक श्वास अभ्यास।
- कपालभाति: एक ऐसा अभ्यास जिसे स्रोत में श्वास और शुद्धि की विधियों के बीच शामिल किया गया है।
- नाड़ी शुद्धि: बारी-बारी से नासिका से साँस लेने का एक पारंपरिक अभ्यास, जिसे योग में शुद्धि और संतुलन से जोड़ा जाता है।
ये अभ्यास इस दृष्टिकोण का श्वास संबंधी घटक हैं और इसके आसनों और ध्यान के पूरक हैं।
4. बंध: यौगिक ताले
उड्डियान बंध कार्यक्रम में बताया गया पेट का बंध है। बंध यौगिक तालों की पारंपरिक पद्धति से संबंधित हैं।
5. मुद्राएँ: यौगिक भाव-भंगिमाएँ
आकाशी मुद्रा कार्यक्रम में शामिल की गई मुद्रा है। मुद्राएँ पारंपरिक योग का हिस्सा हैं और इनमें शारीरिक स्थिति, भाव-भंगिमा और जागरूकता की दिशा शामिल हो सकती है।
6. ध्यान: मनन
ध्यान कार्यक्रम का चिंतनशील घटक है। इसमें ध्यान को भीतर की ओर ले जाना और शरीर, श्वास और मन की गतिविधि के प्रति जागरूकता विकसित करना शामिल है। इस दृष्टिकोण में इसे स्थिरता और अधिक शांत मन की अवस्था से जोड़ा गया है।
7. यौगिक आहार
आहार संबंधी दृष्टिकोण सरल, पौष्टिक, ताज़ा पके हुए शाकाहारी भोजन पर केंद्रित है। यौगिक परंपरा इसे सात्त्विक भोजन शैली कहती है। विवरण में प्रेम से परोसे गए और सुखद संगति में खाए गए भोजन को भी महत्व दिया गया है।
इसके चार आहार-विषय हैं:
- कम नमक: जल-धारण के संदर्भ में चर्चा की गई है।
- चाय, कॉफ़ी और कोला: कैफ़ीन होने के कारण इन्हें उत्तेजक पेय के रूप में चर्चा में रखा गया है।
- मांस और डेयरी की संतृप्त वसा: स्रोत में इसकी चर्चा वसा अम्लों के चयापचय और हार्मोन संतुलन के संबंध में की गई है।
- चीनी का सेवन: वज़न बढ़ने और मन के उतरे रहने के संदर्भ में चर्चा की गई है।
ये विषय मिलकर कार्यक्रम का पोषण संबंधी घटक बनाते हैं।
8. योग-संगीत: योग का संगीत
संगीत वाले घटक में बिलहरी राग और असावरी राग का नाम दिया गया है। इनका शामिल किया जाना उस भूमिका को दर्शाता है जो व्यापक यौगिक दृष्टिकोण में गति, श्वास और ध्यान के साथ संगीत को दी गई है।
9. उपवास
उपवास को नौवें घटक के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। दी गई सामग्री में कोई विशेष विधि, अवधि या कार्यक्रम निर्दिष्ट नहीं है।
व्यायाम, विश्राम और प्रस्तावित यौगिक व्याख्या
विवरण में नियमित व्यायाम की चर्चा मासिक धर्म से पहले की असुविधा में कमी के संबंध में की गई है। व्यायाम की दिनचर्या के उदाहरण के रूप में इसमें प्रतिदिन सुबह लगभग एक घंटे की तेज़ सैर बताई गई है।
योग की इसकी व्याख्या शरीर, मन और अंतःस्रावी तंत्र (एंडोक्राइन सिस्टम) के आपसी संबंध पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कुछ विशेष आसनों का अंतःस्रावी अंगों से संबंध होता है, और आसन, प्राणायाम तथा ध्यान को ऐसे अभ्यासों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिनका उद्देश्य शारीरिक विश्राम लाना है।
इस प्रस्तावित व्याख्या के अनुसार, अधिक शिथिल शारीरिक और मानसिक अवस्था को आंतरिक प्रक्रियाओं के बेहतर समन्वय से जोड़ा गया है। विवरण इसे अंतःस्रावी ग्रंथियों के बीच बेहतर तालमेल और मासिक धर्म से पहले की परेशानी में कमी के रूप में बताता है।
इसलिए यह कार्यक्रम शारीरिक अभ्यास और भीतर की ओर ध्यान को एक साथ लाता है, और इसके पारंपरिक यौगिक ढाँचे के अतिरिक्त तत्वों के रूप में आहार और संगीत भी शामिल हैं।
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