योग में तडागी मुद्रा: विधि, लाभ और निषेध
तडागी मुद्रा स्वास्थ्य लाभों से भरपूर एक शक्तिशाली यौगिक तकनीक है। लेकिन यह प्राचीन अभ्यास, जिसे काय मुद्रा या यौगिक शारीरिक मुद्रा कहा जाता है, आधुनिक योग में बहुत कम सिखाया जाता है। काय मुद्रा योग मुद्राओं के पाँच प्रकारों में से एक है। अन्य चार हैं: हस्त मुद्रा (हाथ), मन मुद्रा (सिर), आधार मुद्रा (श्रोणि) और बंध (शारीरिक ताला)।
तडागी को तालाब मुद्रा या सरोवर मुद्रा भी कहा जाता है, और अंग्रेज़ी में इसे सबसे अधिक "बैरल-उदर तकनीक" (फूले हुए पेट की तकनीक) कहा जाता है। यह पाचन-अग्नि, समान वायु और सौर-जाल, यानी मणिपुर चक्र, को लक्षित करती है। ये तीनों ऊर्जा के अवशोषण और संचरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह श्रोणि-तल और उदर की मांसपेशियों तथा अंगों को भी सुदृढ़ करती है।
"तडागी मुद्रा श्वास-रोक वाला एक मध्यम स्तर का यौगिक अभ्यास है। इसका प्रयास कुछ महीनों के आसन और प्राणायाम के अभ्यास के बाद ही करें, और तब, जब आप श्वास-चक्र के भाग, श्वास-स्थगन और तीन प्रमुख बंधों को सीख चुके हों," सोन्जा कहती हैं, जो विन्यास योग की प्रशिक्षक हैं।
"आप तडागी का प्रयोग स्वतंत्र अभ्यास के रूप में पाचन और ऊर्जा-स्तर सुधारने के लिए, या आसन-क्रम में संक्रमण की मुद्रा के रूप में कर सकती हैं। शुरुआती साधक सुलभ तडागी मुद्रा नामक सरल रूपांतर का प्रयास कर सकते हैं, और अनुभवी योगी उड्डीयान बंध के साथ तडागी का अभ्यास कर सकते हैं," वे आगे जोड़ती हैं।
इस लेख में हम तडागी मुद्रा की विधि, लाभ, सावधानियों और रूपांतरों पर चर्चा करते हैं।
तडागी मुद्रा क्या है
तडागी (तडाग) कृत्रिम तालाब या जलाशय के लिए संस्कृत शब्द है और मुद्रा (मुद्रा) का संस्कृत में अर्थ मुहर या भाव-भंगिमा है। साथ मिलाने पर तडागी मुद्रा का अर्थ बैठकर आगे झुकने वाली ऐसी यौगिक मुद्रा से है, जिसमें पेट को भीतर खींचा जाता है। पेट का आकार अवतल (भीतर की ओर धँसा हुआ) हो जाता है, जो कृत्रिम तालाब जैसा दिखता है। इसी कारण इस अभ्यास को तडागी मुद्रा नाम मिला है।
ध्यान दें कि यह काय मुद्रा (शारीरिक भाव-भंगिमा) की श्रेणी का मध्यम स्तर का अभ्यास है। योग के नए साधकों को तडागी का प्रयास करने से पहले शरीर को इन योगासनों से तैयार करना चाहिए:
- दंडासन (डंडे जैसी मुद्रा)
- अर्ध उत्तानासन (आधा आगे झुकना)
- अर्ध हलासन (आधा हल मुद्रा)
- उत्तानपादासन (उठे हुए पैर की मुद्रा)
- जानु शीर्षासन (सिर से घुटने की मुद्रा)
- पार्श्वोत्तानासन (बगल का खिंचाव)
- पश्चिमोत्तानासन (बैठकर आगे झुकना)
एक बार लचीलापन आ जाने पर विलोम और प्रतिलोम प्राणायाम का अभ्यास करें, क्योंकि तडागी मुद्रा में उच्छ्वास और अंतःश्वास के बीच लंबा विराम होता है। इसलिए इस काय मुद्रा का प्रयास करने से पहले सुनिश्चित करें कि आप 10 से 15 सेकंड तक श्वास रोक सकते हैं।
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तडागी मुद्रा का अभ्यास करने और इस यौगिक अभ्यास के लाभ पाने की विधि यहाँ दी गई है।
चरण-दर-चरण विधि
पहला चरण: तैयारी
तडागी मुद्रा की आधार मुद्रा दंडासन, यानी डंडे जैसी मुद्रा, है। अपनी मैट बिछाएँ और पैरों को थोड़ा अलग रखकर शुरुआती स्थिति में बैठें। धीमी, गहरी श्वास के साथ कुछ मिनट स्वयं को शांत करें। आँखें बंद करें और शरीर को शिथिल करें, विशेषकर गर्दन, जबड़े और पेट को।
दूसरा चरण: प्रवेश
कूल्हों से ऊपरी शरीर को झुकाएँ और भुजाओं को सामने फैलाकर आगे की ओर झुकें। अँगूठे और उँगलियों से पैर की उँगलियों को पकड़ें। सामने देखें और नज़र को ज़मीन की ओर न झुकाएँ। गहरी श्वास लें और पेट को पूरी तरह फूलने दें। फेफड़ों को पूरी तरह खाली करें और शुरू करें।
तीसरा चरण: तालाब बनाएँ
यहाँ आप पूरे चरण के दौरान श्वास को रोके रखते हैं। श्वास रोकते (बाह्य कुंभक) हुए डायाफ्राम या पसली-पिंजर को बाहर की ओर धकेलें। इससे पेट भीतर की ओर धँस जाएगा। अपनी जागरूकता को उदर के "तालाब" पर रखें। बिना खिंचाव के जब तक रोक सकें, इस स्थिति को रोके रखें।
विशेष सुझाव: आप मन ही मन "रं" का जप कर सकते हैं, जो मणिपुर चक्र का बीज मंत्र है।
चौथा चरण: मुक्त होना
तडागी से बाहर आने के लिए पेट को शिथिल करें, पैर की उँगलियों की पकड़ छोड़ें और ठोड़ी-से-छाती वाले ताले को छोड़ें। श्वास भीतर लेते हुए धीरे-धीरे शुरुआती स्थिति (दंडासन) में लौट आएँ। आपने तडागी मुद्रा का एक चक्र पूरा कर लिया। आप आधार मुद्रा में रुके रह सकते हैं या एक और चक्र का प्रयास कर सकते हैं।
समय और अवधि
तडागी मुद्रा खाली पेट, सुबह जल्दी या अंतिम भोजन के तीन घंटे बाद करनी चाहिए। शुरुआती साधक एक सत्र में तीन चक्र कर सकते हैं और धीरे-धीरे पाँच चक्रों तक बढ़ सकते हैं। एक और चक्र जोड़ने से पहले श्वास-रोक की अवधि 15 सेकंड तक बढ़ाएँ।
रूपांतरण और संशोधन
तडागी मुद्रा के अभ्यास के दो से अधिक रूपांतर हैं। यहाँ हम योगियों द्वारा प्रयुक्त तडागी के दो सबसे प्रचलित रूपांतरों का उल्लेख करते हैं। पहला रूपांतर शुरुआती साधकों के लिए आदर्श है और दूसरे का प्रयास केवल मूल अभ्यास और योग बंधों पर महारत पाने के बाद ही करना चाहिए।
सुलभ तडागी मुद्रा
शुरुआती साधक सुलभ तडागी मुद्रा नामक सरल संस्करण का प्रयास कर सकते हैं, जो मूलतः वही अभ्यास है लेकिन चित लेटकर, यानी पीठ के बल, किया जाता है। इसके लिए शवासन (शव मुद्रा) में आएँ, घुटनों को तब तक मोड़ें जब तक वे नितंबों को न छू लें, और आँखें बंद करें। अपना बायाँ हाथ पेट पर रखें और दाएँ हाथ से विष्णु मुद्रा बनाएँ।
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